युक्तियुक्त - 25th January 2026
- meshramrupali86
- hace 6 días
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अव्यक्त इशारा - 25th January 2026:
ज्ञान-स्वरूप मास्टर नॉलेजफुल, मास्टर सर्वशक्तिमान होने के बाद अगर कोई ऐसा कर्म जो युक्तियुक्त नहीं है, वह कर लेते हो तो इस कर्म का बन्धन अज्ञान काल के कर्मबन्धन से पदमगुणा ज्यादा है। इस कारण बन्धनयुक्त आत्मा स्वतन्त्र न होने कारण जो चाहे वह नहीं कर पाती। इसलिए युक्तियुक्त कर्म द्वारा मुक्ति को प्राप्त करो।
Summary - Insights by Resp. Mohini Didi ji:
व्यक्त अर्थात देहभान और अव्यक्त अर्थात देही-अभिमानी यानि इंद्रियों से न्यारे। अतिइंद्रिय सुख अव्यक्त स्थिति में ही हो सकता है। उदाहरण - विष्णु जी शेषनाग की शैया पर लेटे हुए दिखाते है - अर्थात पांचों ही विकार, सर्व कर्मइंद्रियां अपने कंट्रोल व संयम में हैं। अव्यक्त स्थिति का बहुत सुख है – उसमें कहावत भी है - “एक चुप सो सुख”। कई बातें अपने आप समय अनुसार, निश्चय के आधार से, धैर्यता रखने से सुलझ जाती हैं, जवाब देना जरूरी नहीं होता।
युक्तियुक्त कर्म का अर्थ चालाकी करना या झूठ बोलना नहीं है, बल्कि ज्ञानयुक्त, योगयुक्त, युक्तियुक्त कर्म करना। ज्ञान - समझ है और योग - एक बाबा से संबंध है। ज्ञान और योग के आधार पर हमारा सोचना, बोलना और कर्म होना चाहिए।
ज्ञान भी देना है लेकिन थोड़ा युक्ति से दो। बाबा हमको कहते थे – कभी भी ज्ञान सुनाते समय argue नहीं करना, सिद्ध करने की कोशिश नहीं करना। हमारा फर्ज बनता है, जो बात है, वो ठीक से समझाना। प्रेम से बताओ। हमको हर धर्म का सम्मान करना चाहिए। कोई भी आत्मा, किसी भी धर्म की है पर - विश्व एक ही परिवार है।
योग मतलब कि अपनी silence में रहो, बाबा की याद में रहो। वो जो vibration है, बहुत काम करता है।
युक्ति एक method (way to do) है, ढंग है। जैसे कहते भी है - युक्ति से हम वो बात करें, जो कोई सीख भी जाए और उसको दुख भी ना हो। इसलिए युक्तियुक्त बहुत अच्छा गुण है। रोज़ अपने को रिफाइन करना है। हमारा सोचना भी, बोलना भी रिफाइन होता जाए, अलौकिक होता जाए।
इसलिए युक्तियुक्त कर्म करके मुक्ति को प्राप्त करो। जैसे हम युक्तियुक्त होते हैं, तो छूट जाते हैं, नहीं तो फंस जाते हैं। कई कहते हैं— हम तो Frank हैं, जो जैसा है, सुना देते हैं। Frankness ऐसी नहीं होती - सच्चाई रहेगी, झूठ नहीं बोलेंगे, लेकिन युक्ति से बोलेंगे।
Detailing of Insights:
ओम शांति।
अव्यक्त स्थिति का सुख - अव्यक्त मास है, अव्यक्त स्थिति का बहुत सुख है। पर वो अतींद्रिय सुख होता है क्योंकि जब अव्यक्त है तो इंद्रियों से न्यारे हैं। अव्यक्त तो यही होता है ना कि व्यक्त जो होता है उसमें देह भान होता है और अव्यक्त में देही-अभिमानी होते हैं।
और फिर जो व्यक्त बातें हैं, व्यक्त वातावरण है – जिसको बाबा ने कहा उसमें व्यर्थ और अनर्थ होने की संभावना होती है। उन सब से जब हम न्यारे हो जाते हैं तो अपने को अव्यक्त, फरिश्ता रूप अनुभव करते हैं। तो उसमें बहुत सुख है।
व्यक्त में जो सुख है वो इंद्रियों के द्वारा है – अच्छा भोजन खाया, अच्छी तरह आराम किया– वे सब व्यक्त के हैं ना, शरीर के हैं। लेकिन अतींद्रिय सुख में रहना वो अव्यक्त स्थिति में हो सकता है।
क्योंकि अगर जो दिखाते हैं ना कि विष्णु शेषनाग की शय्या पर बहुत ही आराम से लेटे हुए हैं। क्योंकि जब पांच विकार अपने control(कन्ट्रोल:वश) में होते हैं – जैसे सर्प है शेषनाग, बहुत बड़ा सांप माना जाता है। तो शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे हैं। मतलब पांच विकार तंग करते रहते हैं, दुख–सुख का खेल आता है, हार–जीत, जय–पराजय, मान–अपमान सब देह अभिमान से ही आता है।
तो इसलिए जो विचार सागर मंथन करते हुए फिर दिखाते हैं – नाभि से ब्रह्मा निकले। तो नाभि से तो ब्रह्मा नहीं निकलते ना। वैसे तो हम कहते हैं विचार सागर मंथन करते- ब्राह्मण सो देवता।
न्यारे–प्यारे ब्रह्मा बाबा: - आज आ रहा था कि हमारे ब्रह्मा बाबा भी शाम के समय पर पहले बैठते थे, फिर ऐसे लेट जाते थे – टांग पर टांग चढ़ा के। और ऐसा लगता था बाबा मगन हैं, अव्यक्त स्थिति थी, न्यारे–प्यारे थे। और उस प्यार में सभी का, आत्माओं का आह्वान, आत्माओं को पालना, आत्माओं का सकाश – वो सेवा करते थे। ऐसे तो देखो बाबा शरीर से भी बहुत active(ऐक्टिव) थे – पैदल चलते थे, भंडारे में जाते थे, कई तरह के। एक बार तो कुआं खोद रहा था तो काफी देर तक पानी नहीं आ रहा था तो बाबा नीचे चला गया। तो सब कहने लगे बाबा आपको क्या जरूरत है, आप क्यों गए नीचे। मतलब कि हर तरह से। बाबा बैडमिंटन(badminton) खेलते थे, क्रिकेट(cricket) खेलते थे। तो बहुत ही शारीरिक रूप से active(ऐक्टिव) थे।
संध्या समय की महिमा: - लेकिन शाम का जो समय होता था, कहते हैं ना कि जब शाम का समय होता है ना वो योग के लिए बहुत अच्छा समय होता है। क्योंकि उस समय पर ऐसा भक्ति मार्ग में मानते थे कि सभी देवताएं भ्रमण के लिए निकलते हैं, वरदान देते हैं सबको। तो जो योग में बैठते हैं या भक्ति मार्ग में कहते थे जो साधना कर रहे होते हैं, बच्चों को कहते हैं जो अच्छे बच्चे हैं उनको वरदान मिलते हैं।
अव्यक्त स्थिति और सकाश - इसलिए संगम युग की जो जीवन है, अव्यक्त स्थिति का जो सुख है – उसमें कहावत भी है “एक चुप सौ सुख”। कई बार ऐसा होता है कि चुप रहना, जवाब देना जरूरी नहीं होता। क्योंकि ये पता है कि कई बातें अपने आप में सुलझ जाती हैं – समय अनुसार, अपने निश्चय के आधार से धैर्यता रखने से। समय अनुसार भी बातें ठीक हो जाती हैं।
आज बाबा ने कहा ना कि संपूर्ण तो बनना ही है और बाबा बनाएंगे भी। तो मुझे ये बहुत अच्छा लगा कि बाबा बनाएंगे। तो आज मुरली में था कि सुनो समय की पुकार, सुनो भक्तों की पुकार, सुनो कोई दुखी है उनकी पुकार सुनो। तो क्या करना है – सकाश देना है अव्यक्त स्थिति में रहकर, विष्णु की तरह सब कर्मेंद्रियों पर संयम करके।
तो आज भी बाबा जो इशारा – अव्यक्त इशारा है “युक्तियुक्त कर्म”। तो मुझे याद है कि कई कहेंगे “वो आपने युक्ति रची है” – वो समझते हैं जैसे हमने चालाकी की है या झूठ बोला है। नहीं – ज्ञान युक्त, योग युक्त, फिर युक्ति युक्त। तो ज्ञान समझ है और योग एक बाबा से संबंध है। समझ और संबंध को समझकर हमारा सोचना, बोलना और कर्म होना चाहिए।
ज्ञान देने की युक्ति - ज्ञान क्या कहता है, क्या सोचो किसी बात को – आप किस तरह से उत्तर दो। तो एक ज्ञान समझाने की युक्ति होती है, एक कर्म करने की युक्ति होती है। तो ज्ञान समझाने की – कोई आता है, समझता है ज्ञान – “परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है” आप कहते हैं। दूसरा होता है कि आप बाबा का परिचय दो ठीक से – परमात्मा पिता है, परमधाम निवासी है। हम कहते भी हैं कि ऊपर से आ जाओ। पूरा परिचय देने के बाद बोलो – ऐसा पिता है, हम उसके बच्चे हैं। तो वो सर्वव्यापी कैसे हो सकता है? हम में, सब में आत्मा है पर परमात्मा नहीं है।
तो बहुत मधुरता से पहले पूरा परिचय दे। ऐसे ही “गीता का भगवान श्री कृष्ण नहीं है” तो बहुत reaction(रिएक्शन:विस्र्द्ध क्रिया) होगा ना। जिन्होंने वर्षों से ये सुनते आए और विश्वास करते आए कि श्री कृष्ण जी ने गीता सुनाई। और आप अचानक ये कह देते हैं कि नहीं शिव ने सुनाई तो उनको धक्का भी लगता है। और वो सोचते – नहीं यहां हम नहीं आएंगे। ऐसा कई बार हुआ है।
परंतु उनको सारा समझाके कि विराट रूप दिखाया जो कई बार जो है वो जिस तरह से वर्णन करते हैं। आत्मा का भी परिचय, गीता का पहला अध्याय में है। दूसरे में कर्म योग है। तो एक–एक अध्याय में जो शिक्षाएं मिलती हैं वो एक परमपिता परमात्मा ही देते हैं आत्माओं को। तो कुछ ऐसे दृष्टांत सुना के फिर बोलो कि गीता तो परमात्मा शिव भी सुनाते हैं। मुरली है उनके, गीत हैं और उन गीतों की तो गीता है ना।
तो इस तरह से ज्ञान भी देना है थोड़ा युक्ति से दो। हमको याद है – हम लोग जब ज्ञान में आए तो बस “विनाश होने वाला है, सतयुग आने वाला है” तो लोग तो यही कहते थे भाई क्या हुआ विनाश का, क्या हुआ। फिर हालांकि आजकल की जो परिस्थिति है उसमें तो बहुत स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई दिन भी world war(वर्ल्ड वॉर: विश्व युध्द) हो सकती है, कोई दिन भी इस तरह के आज के circumstances(सर्कमस्टान्सेस: परिस्थिति) हैं। हमको कहना नहीं पड़ता है। अभी तो यही कहना है कि स्थापना हो रही है, आप भी स्थापना में भाग लो – मन वचन कर्म से स्थापना के कार्य में सहयोगी बनो, खुद राजयोगी बनो।
तो इस तरह से युक्ति से अगर हम ज्ञान सुनाते हैं, फिर होता है कि समझ है ना – ज्ञान। तो जो उत्तर भी दे किसी बात का – ज्ञान युक्त हो। और दूसरा योगयुक्त – बाबा की याद में।
सर्वधर्म सम्मान और कल्पवृक्ष - और किसी ने कहा कि “जब ये बहन course(कोर्स) कराती है तो ऐसा लगता है कि उसको अपने धर्म का अहम भाव है। तो हमें ऐसा लगता है कि जैसे वो हमारे धर्म में विश्वास नहीं करते।” तो मैंने सोचा ऐसे क्यों लगता होगा। तो इसलिए जैसे हर एक देखो झाड़ है, कल्प वृक्ष है – इतनी शाखाएं हैं पर बीज तो एक ही है। बीज एक परमात्मा है। और जो उसके roots(रूट्स) हैं, जड़ें हैं – उसमें तपस्वी हैं, आदि सनातन देवी–देवता धर्म की आत्माएं हैं। क्योंकि उस बीज से जो वृक्ष निकलना है, उसका जो तना है वो देवी–देवता धर्म। तना एक ही होता है वृक्ष का। और फिर शाखाएं उसकी बहुत सारी हैं। तो एक ही बीज से निकले हुए, एक ही जड़ें हैं।
तो हर धर्म का हमको उसका सम्मान करना चाहिए। कोई भी आत्मा किसी भी धर्म की है पर एक ही परिवार है ना – विश्व परिवार एक ही है। अलग–अलग शाखाएं हैं और वृक्ष एक है।
तो जैसे एक समझ से अगर हम जो भी ज्ञान सुनने आते हैं, उनको हम यह सिद्ध करना चाहते नहीं हैं कि आप जो कुछ करते हो वो गलत है, आप जो कुछ करते हो वो ठीक नहीं है। नहीं, हमारा फर्ज बनता है उनको जो बात है वो ठीक से समझाना। तो उनके अंदर भावना आती है और उनका विचार चलना शुरू हो जाता है कि ये लोग जो सुना रहे हैं, बात तो ठीक लगती है।
बाबा हमको कहते थे – कभी भी बच्चे ज्ञान सुनाते समय argue(ऑरग्यू:बहस) नहीं करना, सिद्ध करने की कोशिश नहीं करना। बाबा ने कहा कि प्रेम से बताओ कि हमको यह समझाया जाता है, हम ये पढ़ते हैं, परमात्मा हमें ये बताते हैं। तो वो युक्ति हो जाती है। उसमें कोई आए ना आए, पर संबंध अच्छे रहते हैं। और दरवाजा खुला है तो वो फिर आ जाते हैं कभी ना कभी। न भी उस समय आए।
युक्ति का व्यावहारिक अर्थ - युक्ति का मतलब है कि ज्ञान और योग के आधार से हमारा सोचना। पहले तो हमारा सोचना – क्योंकि जैसे जो हम सोचते हैं, वैसी वाणी हो ही जाती है। चाहे हम कितना भी कहें कि वाणी ठीक करनी है – नहीं, पहले सोच ठीक करो कि हमें सबको सम्मान देना है। कोई कैसा भी होता है। कोई non-veg(नाॅन वेज)वाला है, उसको बोलो कि बहुत बदबू आती है। कई बार plane(प्लेन) में भी smell(स्मेल:बदबू) आती है तो क्या करते हैं। तो उनको तो नहीं रोक सकते ना, पर अपनी नाक पर कुछ रख लेते हैं कि हमें उसकी smell(स्मेल:बदबू) ना आए। तो युक्ति से चलना होता है। और योग मतलब कि अपनी silence(सैलेन्स:शांति) में रहो, बाबा की याद में रहो। तो वो जो vibration(वैब्रेशन) है ना वो बहुत काम करती है। तो इसलिए बाबा हमेशा कहता है बच्चे – ज्ञान युक्त, योग युक्त और फिर युक्तियुक्त।
तो युक्ति एक method(मेथड: विध) है – the way to do(करने का तरीका) कहते हैं ना, ढंग है। एक हर एक के बोलने का ढंग होता है। उस सूक्ष्म में जैसे किसी को दोषी ठहराना, उसको ऐसा महसूस कराना कि नहीं तुम समझदार नहीं हो। और एक होता है कि हाँ भूल होती है – उसको इतने युक्ति से हम वो बात करें। कोई सीख भी जाए और दुख भी ना हो। तो इसलिए युक्तियुक्त बहुत अच्छा गुण है और ऐसे हम विधि लेते रहेंगे तो सिद्धि तो जरूर प्राप्त होगी।
Experience: यह थोड़ा सोचने की बात है की देखो, विघ्न आते हैं ना। मुझे याद है, हम जब ज्ञान में आए तो बहुत रोकने की कोशिश करते थे। तो हम कहते थे—ठीक है, नहीं जाएंगे। तो उनको खुद ही रहम पड़ता था, अच्छा जाओ, जाना है तो। लेकिन अगर सामना करते हैं ना—अभी माँ-बाप कहते हैं—तो वे अपने हिसाब से ठीक ही कहते हैं ना। कन्या हो, फिर बाद में क्या होगा, वह तो अपनी तरह से ठीक ही सोच रहे हैं ना।
पहली बार ऐसा हुआ ना। पहले साधु-संत, महात्माएँ थे, बहनें तो बहुत कम सन्यासी होती थीं ना। अभी तक भी कई धर्मों में कभी बहनों को Top position(टॉप पोज़ीशन:शीर्ष स्थान) पर नहीं रखते हैं। बाबा ही जब आते हैं, तो माताओं-बहनों को आगे रखते हैं, ऊँच बनाते हैं। ज्ञान का कलश भी माताओं को देते हैं। रोज़ अपने को refine(रिफाइन:परिष्कृत) करना है। हमारा सोचना भी, बोलना भी refine(रिफाइन) होता जाए, अलौकिक होता जाए।
युक्तियुक्त कर्म से मुक्ति - ज्ञान तो सभी के पास है, सुनाने वाले के पास भी है, सुनने वाले के पास भी है। लेकिन हम बच्चों का युक्तियुक्त, अनुभव-युक्त प्रेम से जो कुछ भी हम अनुभव बताते हैं उससे आत्माओं को प्राप्ति होती है। जैसे एक-एक बंधन छूट जाते हैं। जैसे हम युक्ति युक्त होते हैं तो छूट जाते हैं। नहीं तो फंस जाते हैं।
Experience: मुझे याद है कि हमारी दादी जब शुरू-शुरू में भारत में, दिल्ली में आई, तो कुछ english(इंग्लीश) words(वोर्ड:शब्द) बहुत आते हैं। उनमें जो बड़े-बड़े word(वर्ड) होते थे, जैसे Philanthropist(फिलाॅॅन्थोफिस्ट;समाज-सेवी)। उस समय हमें भी नहीं पता था कि वह क्या होता है। और कुछ ऐसे शब्द वो बोलती थीं, तो लोग सोचते थे कि ये तो बहुत पढ़ी-लिखी हैं। इतनी बढ़िया इंग्लिश शब्द बोलती हैं। तो लोग उनसे इंग्लिश में बात करने लगते थे। तो दादियां कहती थीं— नो इंग्लिश। तो कहने का भाव यह है कि ऐसे ही शास्त्रों के बारे में बाबा कहते थे— तुम एक reference(रेफरेंस:जिक्र) दोगे ना, तो वो तुमसे 10 Questions(क्वेषन:प्रश्न) पूछेंगे, और तुमने तो पढ़े नहीं हैं।तो कोशिश करके बाबा जो उदाहरण देते हैं ना, वही उदाहरण दो। तो आपके लिए easy(ईजी:सहज)रहेगा और आप उसको समझा भी पाओगे।
तो युक्ति से ही मुक्ति मिलती है— इसका अनुभव हमें करना चाहिए। और बाबा जो कहता है ना कि मुक्ति भी मिलेगी, तो उस पर अटेंशन देकर, समझ से चलना है। हर कदम पर, अभी भी आज भी समय ऐसा है कि युक्तियुक्त होना पड़ता है।कई कहते हैं— “हम तो Frank(फ्रैंक:स्पष्टवादी) हैं, जो जैसा है सुना देते हैं”। तो Frankness(फ्रैंकनेस) जो है ना, वो ऐसी नहीं होती है। हाँ, सच्चाई रहेगी, झूठ तो नहीं बोलेंगे ना, लेकिन युक्ति से तो बोलेंगे ना।
दादी का उदाहरण - दादी जानकी ने एक कहानी सुनाई कि हमारे पड़ोस में कुछ झगड़े चल रहे थे। तो पुलिस आई और पूछा— “आपको सुनाई पड़ता है?” तो दादी ने कहा— “नहीं, सुनते तो नहीं हैं, हमें तो कुछ सुनाई नहीं पड़ता।” तो किसी ने कहा— “आपको पड़ता था।” दादी से कहा—”हाँ”। तो आपने क्यों नहीं बताया?तो दादी ने कहा— “मुझे थोड़े ही गवाही देने कोर्ट में जाना है।” तो neutral हो जाते हैं ना, जैसे। कई तरह से ऐसे अच्छे-अच्छे उदाहरण हम सुनते हैं, जो यज्ञ में हमारे बड़ों ने यूज़ किए। उसी युक्ति से हमें भी यज्ञ को निर्विघ्न आगे बढ़ाते जाना है।
अभ्यास - सभी कुछ मिनटों के लिए युक्तियुक्त से मुक्ति मिलती है। इस पर संकल्प रख कर के अपने मन-बुद्धि को एकाग्र करेंगे।
ओम शांति।



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